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आध्यात्म समवसरण में आचार्य महाश्रमणजी की वाणी बनी जनकल्याणी

कोलकाता, समाज्ञा रिपोर्टर               

महावीर के पथगामी जैन तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमणजी का प्रवचन सुनने कोलकाता न्यू टाउन राजरहाट महाश्रमण विहार में हजारों की संख्या में लोग उपस्थित थे। सावन माह में अध्यात्मवेता की अमृतवाणी से आध्यात्मिक समवसरण निहाल हो उठा। जीवन उपयोगी दिशाबोध पाकर जनमानस स्वयं को कृतार्थ महसूस कर रहा है। आचार्यश्री ने आगमवाणी के सूत्रों पर व्याख्या करते हुए बताया कि जगत में असली उपकारी कौन होता है। जो कल्याणकारी हो, हितकारी हो, परोपकारी हो वे उपकारी की श्रेणी में आते हैं। उपकारी शब्द की ववेचना करते हुए कहा क उपकारी मनुष्य भी हो सकता है, उपकारी प्रकृत भी हो सकती है, पेड़-पौधे भी हो सकते हैं। वृक्ष का उदाहरण देते हुए फरमाया कि तीन प्रकार के वृक्ष होते हैं – पहला पत्तों वाला, दूसरा फूलों वाला, तीसरा फल वाला। तीनों ही एक दृष्टि से उपकारी होते हैं। पत्तों वाला वृक्ष छाया देता है, फूलों वाला वृक्ष छाया के साथ सुंगधी भी देता है एवं फलों वाला वृक्ष छाया, सुगंध और साथ में सम्पोषण के लए फल भी देता है। इस प्रकार विशिष्ट, विशिष्टतर एवं विशिष्टतम उपकारी की तरह हर वृक्ष की अपनी गरिमा है। इसी प्रकार तीन प्रकार के उपकारी आदमी होते हैं।

पहला – अल्प उपकारी, दूसरा- विशेष उपकारी, तीसरा- विशिष्टतम उपकारी। जैसे मकान दिया, मकान के साथ में आगत को वात्सल्य भी दिया, तीसरा मकान और वत्सलता के साथ भोजन भी दिया इस तरह उपकारी व्यक्त की श्रेणियों के बारे में प्रेरणादायी इंगित प्रदान किया। आर्यवर ने धर्म के क्षेत्र में भी साधुओं के प्रकार बताते हुए जीवन में उपकार की भावना को समाविष्ट करने की प्रेरणा दी। साधु भी तीन प्रकार से उपकारी हो सकते हैं। एक सामान्य साधु होता है। जो श्रावक को वंदना करने पर आशीर्वाद देता है, पर प्रोत्साहन नहीं देता, अपने काम में व्यस्त हो जाता है। दूसरे प्रकार के साधु वे हैं जो श्रावक से उसके हालचाल पूछता है, उससे वार्तालाप करता है, विशिष्टतम साधु वो होते हैं जो श्रावक का हालचाल भी पूछता है तथा उसे आध्यात्म की प्रेरणा भी देते है। गुरुदेव ने फरमाया कि उपकार व्यवहार जगत में दान से भी कया जा सकता है। दरिद्र वह नहीं होता जसके पास कुछ नहीं होता बल्कि ाास्त्रों के आधार पर दरिद्र वह होता है जिसके पास सहयोग का सामर्थ्य होता है पर वक्त पर मनाही कर देता है। मौका आने पर जो सहयोग न दे सके वह सबसे ज्यादा दरिद्र माना गया  है। उसके पास रु. नहीं अहंकार ज्यादा है, उसकी वजह से वह वक्त पर किसी के काम नहीं आ पाता है। इस प्रकार जनउपयोगी उपदेशात्मक वाणी सुनकर श्रावक समाज श्रद्धानत हो गया। आचार्य प्रवर के पदार्पण से पूर्व महाश्रमणी साध्वी प्रमुखाश्री कनकप्रभाजी श्रावकत्व विषय पर विवेचना की।

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