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आचार्य श्री महाश्रमणजी का पावन प्रवास राजारहाट में

कोलकाता : जैन धर्म एक अत प्राचीन सर्वमान्य अनुकरणीय धर्म रहा है, जिसने अपने सुसिद्धान्तों के द्वारा प्राणीमात्र को कर्म नर्जरा एवं आत्मकल्याण का मार्ग बताया। महापुरुषों का गुणगान करना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है। जीवन के सत्य को खोजने के लए भगवान महावीर ने कठोर साधना की तथा त्याग का मार्ग अपनाया और अपनी दिव्य देशना से समूची मानवता को प्रकाशमान किया। उसी पथ पर हमारे आचार्य एवं श्रमण-श्रमणियां अग्रसर हैं। साधु-संतों का आदर्स और प्रेरणादायी जीवन सम्पूर्ण मानव जाति को मार्गदर्शन व दिशाबोध देता आया है। ज्ञान के अपरमेय महासागर आचार्य श्री महाश्रमणजी परोपकार व जनकल्याण के विराट मान को लेकर कोलकाता के राजारहाट स्थित महाश्रमण विहार में वराज रहे हैं। आज के मुख्य प्रवचन में संघ निदेशिका महाश्रमणी कनकप्रभाजी ने अपने मंगल उद्बोधन में फरमाया कि धर्म तथा तत्व में श्रद्धा रखने का एवं जानने का प्रयास करना चाहिए। सर्फ जैन कुल में जन्म लेने से ही कोई जैन नहीं बन जाता, बल्कि जीवन में धर्म के संस्कारों को अपनाने से कल्याण हो सकता है। जैन श्रावक-श्रावका को नव तत्व के बारे में जानकारी अवश्य होनी चाहए। नवतत्व – जीव-अजीव, पुण्य-पाप, आश्रव, संवर, नर्जरा, बन्ध एवं मोक्ष। जानूं जीव-अजीव मैं पुण्य पाप की बात, आश्रव संवर नर्जरा बंध मोक्ष विख्यात। आश्रव का निरोध करना संवर है।

बारह व्रती श्रावक अांतः संवर साधना करता है। चारों गतियों में – नरक, तर्यंच, देव एवं मनुष्य गत में से सर्फ, मनुष्य गत ही ऐसी है, जसमें मनुष्य सोचकर लक्ष्य नर्धारत कर सकता है एवं अपने पुरुषार्थ से परम् लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। अहिंसा के तीन प्रकार-मानसिक, वाचक, कायक है। मानसक हिंसा में व्यक्ति किसी का बुरा न सोचे न करे, वाचक में कटु ाब्द न बोले एवं वाणी संयम करे, कायक में प्राण वियोजन न करे। अनर्थ हिंसा से बचें। श्रावक सुपात्र दान देने की भावना रखें। चतुर्मास में श्रावक-श्रावकाओं में त्याग-तपस्या की भावना ज्यादा से ज्यादा बढ़े, तपस्या कर्म निर्जरा का साधन है। मनुष्य अपनी अज्ञानता के वशीभूत होकर कर्मों का बंधन करता है। निर्जरा के द्वारा कर्मों को हल्का कर सकता है। संयमित जीवन जीने का प्रयास करें।

गुरुदेव अचल मुनि, भरत मुनि का चातुर्मासिक मंगल प्रवेश

परमपूज्य गुरुदेव सुमति प्रकाशजी महाराज साहेब के सुशिष्य गुरुदेव अचल मुनि एवं भरत मुनि म.सा. का मंगलप्रवेश नौलखा उपासनालय, श्री जैनश्‍वेताम्बर स्थानकवासी (गुजराती) संघ में चातुर्मासिक मंगल प्रवेश सैकड़ों भक्तों की उपस्थिति में हुआ। जैन भक्तों की ओर से अहिंसा भवन  से भव्य रैली निकाली गयी जो राय स्ट्रीट, ऐलगिन रोड, ऊडवर्न स्ट्रीट, एजीसी बोस रोड, बेंटिक स्ट्रीट, राधाबाजार स्ट्रीट होते हुए नौलखा उपासनालय पहुंची। जहां अध्यक्ष रमणीकभय खारा ट्रस्ट्रीगण अहिंसा भवन, कमानी जैन संघ, टालीगंज संघ, महावीर सदन, हावड़ा पावनधाम, जमशेदपुर संघ, भुवनेश्‍वर संघ के प्रतिनिधियों ने मुनिजनों का भव्य स्वागत किया। मंगलाचरण के बाद महाराजजी ने धर्मोपदेश दिया। इस मौके पर सभी मेहबानों का स्वागत किया गया। कार्यक्रमों को सफल बनाने में पूर्व भारत जैन संघ, श्री ललित महिला मंडल, श्री जैन युवक समिति, श्री प्राण महिला मंडल, लुक एंड लर्न, अर्हम युवा ग्रुप, अहिंसा भवन महिला मंडल के सदस्य सक्रिय रहे। संघ की ओर बिनायभाई साह, बटुकभाई मेहता, जीतू भाई साह, चन्देश मेघानी, दिलेश मीमानी, दिलेश पटेल, हर्षद बाकरा, प्रवीणबाई खारा, हर्षदभाई मयाणी, पंकज देसाई, भावेश चौवटिया, संदीप जैन, हरीश जैन, सतीश जैन (हाबड़ा), मधुभाई गटानी, बीर प्रकाश जैन, ललितभाई दोषी, रजनी देसाई आदि ने मुनिजनों का स्वागत किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन श्रीमती शर्मिला जसानी ने किया। 

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