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आचार्य श्री महाश्रमण चातुर्मासक पावन प्रवास

कोलकाता : कोलकाता राजारहाट पूज्य प्रवर के चतुर्मासिक मंगल प्रवेश के बाद से ही कोलकाता के साथ साथ देश-विदेश से श्रद्धालुओं का दर्शनार्थ हेतु तांता लगा हुआ है। राजारहाट क्षेत्र में नवनिर्मित महाश्रमण विहार से आचार्य श्री महाश्रमणजी अपने प्रवचन द्वारा जन मानस को उत्कृष्ट जीवन जीने की प्रेरणा दे रहे है। भारत में विभन्न धर्मों में अपनी-अपनी धार्मिक मान्यताएं एवं साधना पद्धतियां हैं। जैन धर्म में चतुर्मास की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। श्रमण भगवान महावीर ने अपने साधनाकाल में विभन्न क्षेत्रों में चतुर्मास किए। चतुर्मास का अर्थ  है – चार मास के लए साधु-साध्वियों का एक स्थान पर ठहरना। चतुर्मास का प्रारंभ वर्षा ऋृतु में होता है। वर्षा के कारण जीव-जन्तुओं की उत्पत्ति बढ़ जाती है। अत: जीवों की रक्षा और संयम साधना के लए चार मास तक साधु-साध्वियों को एक स्थान पर रूकने का शास्त्रीय विधान है। आज की बढ़ती मायावृत्ति एवं शिथिलाचार के बावजूद महावीर की परम्परा के श्रमण और श्रमणी वर्ग जिस सूक्ष्म अहिंसा का पालन कर अपनी जीवनचर्या चलाते हैं, वैसी कठोर आचार संहिता अन्यत्र मिलनी कठिन है। सर्वज्ञों के सिद्धान्त वर्तमान, भूत और भविष्य निर्माण के आधार स्तंभ हैं। आचार्य प्रवर ने अपने मंगल उद्बोधन में फरमाया – आध्यात्म जागृत के लए श्रद्धा और विवेक से कार्य करना चाहिए। साधु की हर प्रवृत्त साधनामय हो – चलना, बोलना, सोना, उठना आद प्रत्येक कार्य विवेकपूर्ण हो। आत्म विकास के लिए ज्ञान और क्रिया का समन्वित प्रयास आवश्यक है। क्षमता के अनुसार त्याग, तपस्या करनी चाहिए।

जीवनशैली व दिनचर्या व्यवस्थित हो। व्यक्ति विवेक के साथ समय का नियोजन करे। विवेक महत्वपूर्ण चक्षु है। विवेक-सम्पन्न व्यक्ति के साथ रहें। स्वविवेक सबसे अच्छा, नहीं तो ज्ञानी व्यक्ति के पास समय नियोजत कर, समय का अच्छा सदुपयोग हो सकता है। चतुर्मास में अधिक से अधिक समय आत्मसाधना में लगाना उपयुक्त है। जीवनशैली प्रशस्त बने, व्यस्त रहें पर अस्त-व्यस्त नहीं। लक्ष्य निर्धारत हो तो मानव जीवन सार्थक हो सकता है। महाश्रमणी साध्वी प्रमुखाश्री कनकप्रभाजी ने प्रेरणा पाथेय प्रदान किया। साध्वीवर्या संबुद्धयााजी ने सुमधुर गीतका का संगान किया एवं वक्तव्य दिया। 2 जुलाई के मंगल प्रवेश के पश्‍चात महाश्रमण विहार में श्रद्धालुओं के स्वागत में कोलकाता की समस्त तेरापंथी सभाएं, महिला मंडल, युवक परिषद, प्रोफेशनल फोरम, अणुव्रत समत एवं अन्य संघीय संस्थाओं के कार्यकर्ता पूर्ण निष्ठा के साथ व्यवस्थाओं को सुगम बनाने का प्रयास कर रहे हैं। श्रावक समाज का सहयोग भी इसमें योगभूत बन रहा है।

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