मूवी रिव्यू नूर: पत्रकार की भूमिका में लोगों का दिल नहीं जीत पाईँ सोनाक्षी

 

नई दिल्ली: बॉलीवुड अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा की फिल्म नूर शुक्रवार को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है. ये फिल्म  सबा इम्तियाज के उपन्यास ‘कराची, यू आर किलिंग मी’ पर आधारित है. इस फिल्म को सुनील सिप्पी ने डायरेक्ट किया है और इसमें कनन गिल, शिबानी दांडेकर और पूरब कोहली जैसे कलाकार प्रमुख भूमिका में हैं. सोनाक्षी इस फिल्म में पत्रकार की भूमिका में हैं और उनके फैंस को इस फिल्म का बेसब्री से इंतजार था. ट्रेलर देखकर लोगों की इस फिल्म से बहुत ही उम्मीदें थीं लेकिन रिलीज होने के बाद इसे कुछ खास रिस्पॉंस नहीं मिल रहा है. समीक्षकों ने भी इस फिल्म को अच्छी रेटिंग नहीं दी है. आपको यहां बताते हैं कि समीक्षकों ने इस फिल्म को कैसा बताया है और कितनी रेटिंग दी है.

जाने माने समीक्षक अजय  ब्रह्मात्ज ने इस फिल्म को दो रेटिंग देते हुए लिखा है, ‘फिल्‍म देखते हुए साफ पता चलता है कि लेखक और निर्देशक को पत्रकार और पत्रकारिता की कोई जानकारी नहीं है. और कोई नहीं तो उपन्‍यासकार सबा इम्तियाज के साथ ही लेखक,निर्देशक और अभिनेत्री की संगत हो जाती तो फिल्‍म मूल के करीब होती. ऐसा आग्रह करना उचित नहीं है कि फिल्‍म उपन्‍यास का अनुसरण करें, लेकिन किसी भी रूपांतरण में यह अपेक्षा की जाती है कि मूल के सार का आधार या विस्‍तार हो. इस पहलू से चुनील सिन्‍हा की नूर निराश करती है. हिंदी में फिल्‍म बनाते समय भाषा, लहजा और मानस पर भी ध्‍यान देना चाहिए.’

 

हिंदुस्तान अखबार की वेबसाइट ने इस फिल्म को ढ़ाई स्टार दिए हैं और लिखा है, ‘नूर महिला रिपोर्टरों को केंद्रीय भूमिका में रख कर बनाई गई एक रुटीन बॉलीवुड फिल्म है. इस कड़ी में ‘लक्ष्य’ (प्रीटि जिंटा), ‘नो वन किल्ड जेसिका’ (रानी मुखर्जी), ‘पेज 3’ (कोंकणा सेन) आदि कई फिल्मों के नाम लिए जा सकते हैं. हालांकि ‘नूर’ का प्रस्तुतिकरण अलग है, लेकिन इसमें सोनाक्षी का किरदार ‘पेज 3’ के कोंकणा के किरदार की याद जरूर दिलाता है. कई कमियों के बावजूद यह फिल्म थोड़ा असर छोड़ती है. कई जगहों पर हंसाती है, कई जगह भावुक भी करती है. यह फिल्म सोशल मीडिया की ताकत को बताती है और पत्रकारीय मूल्यों के आदर्श के बारे में भी थोड़ी बात करती है.’

आज तक की वेबसाइट पर आर जे आलोक ने दो स्टार देते हुए लिखा है, ‘फिल्म की कमजोर कड़ी इसकी कहानी है जो काफी बोरिंग है और बहुत ही धीरे धीरे चलती है , इसकी रफ़्तार तेज की जा सकती थी और साथ ही जिस नॉवेल पर आधारित यह फिल्म है उसमें कई सारे उतार चढ़ाव और थ्रिलिंग एलिमेंट्स होते हैं पर फिल्म को कोई और ही रूप दे दिया गया है जिसकी वजह से काफी फीकी फीकी सी कहानी बन गयी. कोई भी किरदार न्यायसंगत सा नजर नहीं आता और कई जगहों पर काफी खींची खींची कहानी लगती है. फिल्म में मुंबई से रिलेटेड एक बड़ा मोनोलॉग है, जिसकी लिखावट तो कमाल की है लेकिन उसे और भी दमदार तरीके से पेच किया जा सकता था. एक जर्नलिस्ट की कहानी फिल्म में दर्शायी गयी है लेकिन जर्नलिस्ट के इर्द गिर्द या असल जिदंगी में चल रही कहानी को दर्शा पाने में सुनहिल असफल रहे हैं

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