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चतुर्मास में ज्ञान-दर्शन, चारित्र एवं तप की आराधना काम्य

कोलकाता, राजरहाट

समाज्ञा रिपोर्टर

अहिंसा के महासूर्य शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमणजी ने आध्यात्म समवसरण में उपस्थित जनमेदनी को उद्बोधन प्रदान करते हुए फरमाया कि तीर्थंकरों ने ज्ञान, दर्शन, चारित्र एवं तप को श्रेष्ठतम मार्ग बताए है। आज चतुर्दशी चातुर्मास से पूर्व की चतुर्दशी  है। चतुर्मास मे ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप की विशेष आराधना होनी चाहिए। आठ महीने की कमी इन चार महीनों में पूरी कर लेनी चाहए। ज्योतपूंज आचार्यश्री महाश्रमण ने फरमाया की पहला अवयव है ज्ञान की आराधना – ज्ञान की आराधना के लए आगम स्वाध्याय से अच्छी खुराक मिल सकती है। स्वाध्याय, सीखना, पढ़ना वाचन अच्छा होना चाहए। कोलकाता के बालक-बालिका एवं युवक-युवतिओं को जैन दर्शन के तत्व ज्ञान से संबंधित 25 बोल याद होने चाहए। रविवार को दो प्रशिक्षण कक्षाएं आयोजित है, तत्व ज्ञान एवं जीवन शैली, वे भी शुरु हो जाए और अन्य अलग अलग प्रशिक्षण कक्षाएं भी लगाएं जाएं। जीव-अजीव का वाचन हो, 25 बोल का खुलासा हो। दर्शन की आराधना – सम्यक्तव दीक्षा के बना कोई भी व्यक्ति वंचित न रहें। गुरु धारणा ग्रहण करें। चारित्र आराधना – चारित्र में साधु-साध्वी जागरुकता रखते है। श्रावक-श्रावकाएं भी यह प्रयास करें की देश चारित्र जितना आगे बढ़े कोशिश करे। तप आराधना – तपस्या होनी चाहिए। चातुर्मास में ज्यादा से ज्यादा तपस्या की जा सकती है। नमस्कार महामंत्र कोट जप महामंत्र का अनुष्ठान हो। जप की साधना से लोग जुड़े यह अच्छा उपक्रम हो सकता है। प्रवचन काल में व्याख्यान श्रवण के समय सामायिक लाभ उठाने का प्रयास हो। जिस प्रकार गहनों से शरीर अलंकृत होता है उसी प्रकार पौषध से उपवास अलंकृत होता है। पौषध उपवास का श्रृंगार है, उपहार है। गुरुवर ने फरमाया क श्रावक समाज ज्ञानशाला एवं उपासक श्रेणी से जुड़े। गुरुवर ने फरमाया क श्रावक ज्ञानाशाला एवं उपासक श्रेणी से जुड़े और यह भावना भी भाए कि कोई वैरागी मुमुक्षु तैयार हो। वैरागी-वैरागन तैयार होने पर अच्छी उपलब्धि हो सकती है। साध्वी प्रमुखा कनकप्रभाजी ने श्रावक संबोध का वाचन करते हुए फरमाया की भगवान महावीर दव्य पुरुष थे। उन्होंने साधनाकाल में अनेकों कष्ट सहन किए। संगम देव ने 20 मारणांतिक कष्ट दिए। सामान्य व्यक्ति वैसा एक कष्ट भी नहीं झेल सकता, पूर्व प्राणांत हो जाए। सभी साधु-संतों ने खड़े होकर मर्यादाओं को दोहराया, हाजरी वाचन हुआ। मुनि जयदीप कुमारजी को      छेदोपस्थापनीय चारित्र बड़ी दीक्षा गुरुदेव द्वारा प्रदान की गई। मुनि जयदीप कुमारजी, समणी मनस्वी प्रज्ञाजी, समणी सरद प्रज्ञाजी, समणी आखिल प्रज्ञाजी ने पिछले 7 दिनों की सुखद अनुभव बताए एवं गुरुदेव के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की। हजारों की संख्या में श्रावक समाज ने गुरुदेव की अमृत वाणी से स्वयं को लाभान्वित कया।

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