मां सरस्वती ने किसे, क्यों और कब दिया था श्राप

जब एक कलाकार नाम और धन के लिए ही परफॉर्म करने लगता है तो वह ज्ञान की देवी सरस्वती को भूल जाता है। उसके लिए जीवन का लक्ष्य प्रसिद्धि पाना भर हो जाता है जबकि हमारा जीवन सिर्फ प्रसिद्धि पाना भर नहीं है।

सरस्वती का श्राप प्रचलित अवधारणा है जिसके बारे में बहुत समय पहले मैंने एक संगीत शिक्षक से सुना था। उन्होंने मुझे इस पूरी अवधारणा को इस तरह समझाया था कि शुरूआत में कोई भी शिष्य अपनी सांगीतिक प्रतिभा का विकास करने के लिए कडी मेहनत करता है ताकि वह संगीत के विभिन्न स्वरों की समझ अपने भीतर पैदा कर सके। इसे ‘तालीम’ कहते हैं।

वह तालीम पाने के लिए अथक परिश्रम करता है खासकर तब जबकि सफलता उसे छकाती रहती है। एक दिन वह सफल हो जाता है। श्रोता उसके लिए तालियां बजाते हैं। वह ताली की उस ध्वनि को सुनता है।

फिर तालियां उसे अधिक मोहित करने लगती हैं। इतनी अधिक कि वह अब ज्यादा से ज्यादा ताली पाने के लिए गाने लगता है और अब अपनी तालीम में आगे बढ़ने का विचार उससे पीछे छूट जाता है।

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