चीन को नहीं थी उम्मीद कि भारत दिखाएगा आंखें, सिक्किम दौरे पर रावत

नई दिल्ली [स्पेशल डेस्क] ।  चीन और भारत के बीच रिश्ते कभी सहज नहीं रहे। पंचशील सिद्धांत के जरिए विकास के पथ पर आगे बढ़ने की सहमति दोनों देशों में बनी। लेकिन 1962 में चीन ने विश्वास आधारित रिश्ते पर जबरदस्त चोट की। 1962 से लेकर अब तक नापाक चाल के जरिए चीन भारत को घेरने की कोशिश करता रहता है। लेकिन हाल ही में सिक्किम इलाके में जिस तरह से भारतीय जवानों ने घुसपैठ करने वाले चीनी सैनिकों को जवाब दिया उसके बाद चीन में बौखलाहट है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लू कांग ने कहा कि किसी भी दूसरे देश को किसी संप्रभु राष्ट्र के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। इन सबके बीच थल सेनाध्यक्ष बिपिन रावत सिक्किम के रूटीन दौरे पर हैं लेकिन इसे हाल ही में हुई झड़प से भी जोड़कर देखा जा रहा है। 

चीन का आरोप और कार्रवाई

चीन ने भारत से अनौपचारिक तौर पर ये शिकायत दर्ज कराई थी कि डोकलाम (भूटान ) में चार-पांच जून की रात भारतीय जवानों के साथ हाथपाई में दो चीनी जवान घायल हो गए थे। पांच जून की सुबह चीनी सैनिकों ने भूटान की तरफ बने भारतीय बंकरों (कोडनेम लालटेन) को ध्वस्त कर दिया। हालांकि दोनों देशों ने आधिकारिक तौर झड़प की पुष्टि नहीं की थी। लेकिन 26 जून को चीनी विदेश मंत्रालय की तरफ से बयान आया कि भारतीय फौज ने सिक्किम क्षेत्र से लगे चीनी सीमा में घुसपैठ की थी। इसके अलावा डोकलाम इलाके में चीन द्वारा सड़क निर्माण को रोकने की कोशिश की गई।

क्या है हकीकत ?

भूटान-चीन सीमा पर भारतीय फौज पहले से ही मौजूद रही है। लेकिन भारतीय जवानों की तरफ से कभी किसी तरह की उकसाने वाली कार्रवाई नहीं हुई। चीन इस बात से परेशान है कि भारत की फौज भूटान में क्यों मौजूद है और भारतीय जवानों ने नियंत्रण रेखा को पार करने की कोशिश क्यों की। इस संबंध में भारत में भूटान के राजदूत वेत्सोप नामग्येल ने कहा कि डोकलाम में चीन के सड़क निर्माण पर उनका देश पहले ही आपत्ति दर्ज करा चुका है। इस संबंध में चीन को डिमार्श जारी कर तत्काल प्रभाव से सड़क निर्माण को रोकने के लिए कहा गया है। 

जानकार की राय

खास बातचीत में चीन मामलों की जानकार अलका आचार्य ने कहा कि चीन गैर कानूनी तरीके से डोकलाम इलाके में सड़क निर्माण कार्य में शामिल है। भूटान सरकार ने इसका प्रतिवाद भी किया है। लेकिन जिस ढंग से सिक्किम में चीनी जवानों और भारतीय फौज के बीच झड़प हुई वो चीन की बौखलाहट है। भारत की स्पष्ट मत है कि मैक्मोहन लाइन के जरिए सीमांकन को चीन को मानना चाहिए। लेकिन चीन अपनी सुविधा के मुताबिक नियमों की व्याख्या करता है। 

चीन के दावों का क्या है सच ?

चीनी विदेश मंत्रालय ने ये नहीं बताया कि आखिर कैसे पहाड़ी इलाके में कई किमी तक पैदल चलकर भारतीय जवान सिक्किम से डोकलाम पहुंचे। जानकारों का कहना है कि ऐसा लग रहा है कि चीन जानबूझकर भूटान को विवाद में घसीटना चाहता है। हाल के दिनों में डोकलाम इलाके में बीजिंग का रुझान बढ़ा है। ल्हासा से यादोंग तक चीन सड़क निर्माण में जुटा हुआ है ताकि दोनों शहरों के बीच 500 किमी दूरी को महज सात घंटे में तय किया जा सके। दरअसल इस सड़क का कुछ हिस्सा भूटान की सीमाक्षेत्र से गुजरता है। इसके अलावा बीजिंग-ल्हासा हाइ स्पीड रेल लाइन को यादोंग तक बढ़ाना चाहता है। बताया जा रहा है कि आने वाले दो वर्षों में चीन इस लाइन पर टेस्ट रन शुरू कर देगा।

 चीन की चेतावनी

चीन ने भारत को चेतावनी देते हुए कहा कि वो अपनी भूल सुधार ले। डोकलाम में भारतीय हस्तक्षेप रुकने के बाद ही वो कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए वो नाथु ला को खोलेगा। चीन का कहना है कि वो अपने अधिकार वाले इलाके में सड़क निर्माण को आगे बढ़ा रहा है। डोकलाम इलाके में उसके सड़क निर्माण से भूटान या भारत का लेना देना नहीं है।

डोकलाम पर चालबाजी

1996 में बीजिंग ने उत्तरी भूटान के पासम लूंग और जाकर लूंग के बदले डोकलाम प्लेट्यू से अपने अधिकार को छोड़ने का प्रस्ताव दिया था। बताया जाता है कि चीन ने भूटान पर इस बात के लिए दबाव बनाया कि वो तब तक सीमा डील पर आगे नहीं बढ़ेगा जब तक भूटान अपने यहां राजनयिक मिशन खोलने की इजाजत नहीं देता है। पूर्व विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ने इस सिलसिले में थिम्पू का दौरा किया था, क्योंकि इस तरह की खबर आ रही थी कि चीन के इन प्रस्तावों पर भूटान हरी झंडी दिखा सकता है। लेकिन 2014 में पीएम मोदी के भूटान दौरे में पीएम शेरिंग टॉगे ने साफ कर दिया कि चीन के साथ हमारा राजनयिक संबंध नहीं है, लिहाजा थिंपू में चीन कैसे अपना दूतावास खोल सकता है।

डोकलाम की कहानी

डोकलाम की कहानी 1950 से शुरू होती है, जब चीन और भारत के बीच विवाद बढ़ने लगा। 26 दिसंबर 1959 को चीनी विदेश मंत्रालय द्वारा जारी दस्तावेज के मुताबिक जिसमें बताया गया है कि चीन और भूटान के बीच कथित मैक्मोहन लाइन के दक्षिण के कुछ इलाकों को लेकर मतभेद है। इसका मतलब ये है कि चीन ने स्वीकार किया कि भूटान के पश्चिम में स्थिति डोकलाम को लेकर किसी तरह का मतभेद नहीं है।

1960 में चीनी नेतृत्व ने ये कहकर तनाव बढ़ा दिया कि भूटानी, सिक्कमी और लद्दाखी ये लोग तिब्बती परिवार के हिस्सा हैं। और ये लोग तिब्बत से संबंध रखते हैं जो चीन का हिस्सा है। 1966 में तिब्बती खानाबदोश चारे की तलाश में चीनी सेना की सुरक्षा में डोकलाम इलाके में दाखिल हुए।1988 में हालात तब खराब हो गये जब चुंबी घाटी पर अधिकार करने के लिए चीनी सेना भूटान में दाखिल हो गई और उसके बाद से वो लगातार रॉयल भूटानी फौज को धमकाने लगे। कभी कभी ऐसा होता है कि वो कई दिनों तक भूटानी चौकियों पर कब्जा जमाए रहते हैं।

पहले भी कई बार हुई घुसपैठ

– भारत और चीन के बीच विवादित इलाका 4000 किलोमीटर का है।

– लेकिन चीन का कहना है कि सीमा विवाद वाला क्षेत्र महज 2000 किलोमीटर का है।

–  जून 2016 में चीन के सैनिक तीन बार भारत की सीमा में आए थे। अरुणाचल प्रदेश में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ऑफ चाइना के 50 सैनिक तीन ग्रुप में भारतीय बॉर्डर में घुसे थे।

–  आईटीबीपी के जवान जब लद्दाख के पांगोंगत्सो झील के पास इंटरनेशनल योगा डे पर योग कर रहे थे। उस वक्त चीनी सैनिकों ने घुसपैठ की कोशिश की थी। 

–  9 जून को 250 चीनी सैनिक अरुणाचल की त्वांग वैली में घुस आए थे।

– 19 जुलाई को भारत और चीन के सैनिक चमोली जिले के बाड़ाहोती में 40 मिनट तक आमने-सामने रहे। 

–  भारत मैक्मोहन लाइन को मानता है। चीन इस लाइन को अवैध मानता है।

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