समाज्ञा

गीता का इतिहास

आचार्य धर्मेन्द्र के हाथ में श्रीमद्भागवतगीता देख नगरसेठ बुलाकीराम ने उत्सुकतावश पूछ लिया,
‘आचार्य, गीता के उपदेश तो मैंने कथा-कहानियों के माध्यम से खूब पढ़े हैं और इस महान ग्रंथ का
सुनाम भी सुना है। लेकिन एक बात बताएं कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस अमर योगविद्या का उपदेश
सर्वप्रथम किसे दिया था और गीता के इतिहास पर भी जरा सा प्रकाश डाल सकें, तो आपकी बड़े कृपा
होगी।’
सेठ बुलाकीराम आचार्य के पुराने शिष्य थे। आचार्य उन्हें निराश कैसे करते। बोले, ‘बुलाकी,
श्रीमद्भावगतगीता का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। सूर्य सभी लोकों के राजा हैं तथा सूर्यदेव यानी
विवस्वान् सूर्यग्रह पर शासन करते हैं, जो उष्मा तथा प्रकाश प्रदान करके अन्य समस्त लोकों को अपने
नियंत्रण में रखते हैं। सूर्य कृष्ण के आदेश पर ही भ्रमण करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने विवस्वान को ही
भगवद्गीता की विद्या समझाने के लिए अपना पहला शिष्य चुना। महाभारत में हमें गीता का इतिहास
प्राप्त होता है, ‘त्रेतायुगादौ च ततो विवस्वान्मनवे ददौ।’ अर्थात् त्रेतायुग के आदि में विवस्वान् ने परमेश्वर
संबंधी इस विज्ञान का उपदेश मनु को दिया और मनुष्यों के जनक मनु ने इसे अपने पुत्र अक्ष्वाकु को
दिया। इक्ष्वाकु इस पृथ्वी के शासक थे और उस रघुकुल के पूर्वज थे, जिसमें भगवान श्रीराम ने अवतार
लिया।’ इससे प्रमाणित होता है कि मानव समाज में महाराज इक्षवाकु के काल से ही भगवद्गीता
विद्यमान थी। लगभग 20,05,000 वर्ष पूर्व मनु ने अपने शिष्य तथा पुत्र इक्ष्वाकु से, जो पृथ्वी के राजा
थे, श्रीमद्भागवतगीता कही। जाहिर है, मनु के पूर्व भगवान ने अपने शिष्य सूर्यदेव विवस्वान को गीता
सुनाई. मोटे अनुमान से गीता कम से कम 12 करोड़ 8 लाख साल पहले कही गई (स्त्रोतः
श्रीमद्भागवतगीता, यथारूप, स्वामी प्रभुपाद) और श्रीभगवान ने करीब 5000 साल पहले इसे अर्जुन से
पुनः कहा।’
सेठ बुलाकीदास ने अपना संशय प्रकट किया, ‘आचार्य, एक बात बताएं सूर्यदेव तो सृष्टि की
रचना हुई तभी से हैं, एक प्रकार से वे श्रीकृष्ण से पहले ही हो चुके हैं, फिर यह कैसे माना जाए कि
श्रीकृष्ण ने ही उन्हें यह उपदेश दिया थाॽ’
आचार्य मुस्कुराकर बोले, ‘यही प्रश्न अर्जुन ने भी श्रीकृष्ण से किया था। इस पर श्रीभगवान ने
कहा, ‘हे अर्जुन, मेरे तथा तुम्हारे अनेकानेक जन्म हो चुके हैं। मुझे तो सब याद है, किंतु तुम्हें उनका
स्मरण नहीं। यद्यपि मैं अजन्मा तथा अविनाशी हूं और यद्यपि मैं समस्त जीवों का स्वामी हूं, तो भी
प्रत्येक युग में मैं अपने आदि दिव्य रूप मे प्रकट होता हूं। जब भी और जहां भी धर्म का पतन होता है
और अधर्म की प्रधानता होने लगती है, तब-तब मैं अवतार लेता हूं।’

आचार्य द्वारा दिए गए इस उत्तर से सेठबुलाकीदास पूर्ण रूप से संतुष्ट हो गए। उन्होंने सिर झुकाकर
आचार्य का अभिवादन किया और प्रस्थान कर गए।

नरोत्तम गोयल