7 साल, 5 लाख मौतें: आखिर सीरिया में कौन किसके खिलाफ लड़ रहा है?

2011 में जब अरब के बाकी देशों में जैस्मिन क्रांति शुरू हुई थी तभी सीरिया में भी इसकी शुरुआत हुई थी. बाकी देशों में सत्ता परिवर्तन हो गए और दशकों से सत्ता पर काबिज तानाशाह शासक या तो मारे गए या जेल में डाल दिए गए. लेकिन सीरिया की कहानी एकदम अलग रास्ते पर चली गई और आज दुनिया के लिए तबाही की ज्वालामुखी बनने की कगार पर है.

कैसे सीरिया बन गया दुनिया का अखाड़ा

7 साल बाद भी सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल असद की सेना और विद्रोहियों के बीच युद्ध जारी है. 5 लाख लोग अब तक मारे जा चुके हैं और इससे भी कई गुणा ज्यादा लोग शरण लेने के लिए पड़ोस के देशों की ओर पलायन कर चुके हैं. कई शहर खंडहर में तब्दील हो चुके हैं. यही नहीं अब सीरिया के युद्ध में अमेरिका, रूस समेत दुनिया की बड़ी ताकतें भी कूद चुकी हैं. यहां तक कि सीरिया संकट को तीसरे विश्व युद्ध की आहट के तौर पर भी देखा जाने लगा है.

लेकिन असल सवाल ये है कि दुनिया की लड़ाई का केंद्र सीरिया ही क्यों बना. सीरिया के समाज में इस युद्ध को लेकर किस तरह की खाई है. कौन किसके पक्ष में है और कौन किसके साथ है?

मामूली विवाद से शुरू हुई थी लड़ाई

ब्रिटेन से आंखों की डॉक्टरी की पढ़ाई किए बशर अल-असद सीरिया की सत्ता पर दशक भर से ज्यादा समय से काबिज थे. जैस्मिन क्रांति के बीच मार्च 2011 में सीरिया के दक्षिणी शहर दाराआ में चार बच्चों ने एक दीवार पर लिख दिया था कि ‘अब तुम्हारी बारी है डॉक्टर’. असद के सुरक्षा बलों ने भित्ति चित्र बनाने वाले चार कलाकारों को गिरफ्तार किया. इनकी रिहाई के लिए विरोध-प्रदर्शन शुरू हुआ. सुरक्षा बलों ने इस विरोध-प्रदर्शन पर गोलीबारी कर दी. इसमें कई लोगों की जान चली गई. फिर जो हालात बिगड़ने शुरू हुए, उस पर आज तक काबू नहीं पाया जा सका है. विरोध प्रदर्शन की आग होम्स, दमिश्क और इदलिब जैसे शहरों में फैल गई.

 

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