धर्म के नाम पर देश के टुकड़े नहीं

उन दिनों मगध में बौद्ध धर्म का बोलबाला था। इस स्थिति से लाभ उठाकर कुछ मठाधीश अपना स्वार्थ साधना चाहते थे। उनमें पूर्वी अंचल के मठाधीश महंत माधवाचार्य प्रमुख थे। वह पड़ोसी राजा देवव्रत से मिले हुए थे और मगधपति भद्रबाहु को कमजोर करना चाहते थे। देवव्रत ने महंत को प्रलोभन दिया था कि मगध पर उसका अधिकार होते ही, वह चौथाई हिस्सा उन्हें दे देगा। भद्रबाहु इससे अनजान थे। वह बौद्धधर्म के महंतों को सम्मान देते थे। इसके विपरीत माधवाचार्य लोगों को भद्रबाहु के खिलाफ भड़काने में लगे थे। एक दिन उन्होंने भद्रबाहु को पत्र लिखा- ‘आप मुझे पच्चीस गांव भेंट में दें, ताकि वहां की आय से मठ और धर्म की रक्षा की जा सके।’ परंतु भद्रबाहु ने अपने पुत्र कुमार प्रियदत्त की सलाह पर उन्हें जवाब भेजा- धर्म की रक्षा करना राजा का काम होता है। अतः एक गांव भी नहीं दिया जा सकता। मगधपति का यह उत्तर पा महंत भड़क उठे। उन्होंने अपने शिष्यों, अनुयायों और धर्मांध प्रजाजनों को तोड़फोड़ करने और लगान न देने के लिए उकसाया। भद्रबाहु रक्तपात के डर से महंत की की बात मानने को तैयार हो गये। किंतु कुमार प्रियदत्त ने उनके इस निश्‍चय का विरोध किया। कहा, ‘पिताजी, ऐसे संदिग्ध चरित्र वाले एक मठाधीश की बात मानेंगे, तो कल अन्य मठाधीश भी अलग-अलग भूखंड़ों की मांग करेंगे। राज्य टूट जाएगा। हम मजबूत होंगे, तभी हमारा धर्म फैलेगा। हम कमजोर होंगे, तो धर्म हमसे छिन जाएगा।’
राजा ने कुमार को शांति स्थापना की जिम्मेदारी सौंपी। राजकुमार प्रियदत्त कुछ सैनिकों को लेकर पूर्वी अंचल की ओर चल पड़ा। महंत और इनके शिष्य देवव्रत के संरक्षण में खड़े थे। देवव्रत के सैनिक मगध की ओऱ बढ़ना चाहते थे। देवव्रत ने दूत के माध्यम से कहलाया, ‘प्रियदत्त, अगर तुम अहिंसा को मानते हो, तो बिना रक्तपात व युद्ध के, मुझे पचास गांव देकर लौट जाओ। उसमें से बारह गांव मैं महंत को धर्म प्रचार हेतु दे दूंगा।’
प्रियदत्त ने कहला भेजा, ‘अहिंसा और धर्म के नाम पर तुम मगध पर अधिकार नहीं कर सकते।’ प्रियदत्त की सेना आगे बढ़ी। उसका रणकौशल देख, देवव्रत की सेना पीछे हट गई। महंत माधवाचार्य पकड़े गए। राजा भद्रबाहु ने महंत से कहा, ‘मुझे दुःख है कि आप धर्म के नाम पर देश को कमजोर करने में लगे हुए थे। धर्म के नाम पर देश को टुकड़ों में नहीं बांटा जा सकता।’ माधवाचार्य उनसे क्षमा मांगने लगे। भद्रबाहु ने राजकुमार प्रियदत्त को उसके साहस पर शाबाशी दी।
                         

                                                                                                                                                                               -शिखर चंद जैन

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