असम में गठबंधन टूटने के बावजूद क्यों फायदे में है BJP

असम में ‘नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2016’ के विरोध में असम गण परिषद् ने एनडीए से नाता तोड़ लिया. पार्टी के अध्यक्ष अतुल बोरा का कहना है कि यह बिल असम समझौते के खिलाफ है. इसके बनने से स्थानीय लोगों को नुकसान होगा. इसलिए हम गठबंधन को तोड़ रहे हैं. लेकिन राजनीतिक जानकारों का कहना है कि आने वाले समय में लोकसभा चुनाव होने हैं इसके पहले यह गठबंधन टूटना भले ही गलत दिख रहा हो पर इसके टूटने से बीजेपी को फायदा होगा.

दरअसल, इस बिल के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, क्रिश्चन शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिल जाएगी. भले ही स्थानीय लोग इससे नाराज होंगे, लेकिन अल्पसंख्यकों की बड़ी तादाद बीजेपी के साथ खड़ी हो सकती है.

ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि असम में अल्पसंख्यकों की तादाद अच्छी खासी है. वहीं, बीजेपी की यहां की लोकसभा सीटों पर भी नजर है. यदि इस कदम से बीजेपी को फायदा होता है तो वो असम से लोकसभा के लिए अपना खाता खोल सकती है. क्योंकि वर्तमान में असम की 14 लोकसभा सीटों में से बीजेपी के पास एक भी लोकसभा सीट नहीं है.

क्या है विधानसभा की स्थिति….

एनडीए से गठबंधन तोड़ने के बावजूद फिलहाल असम गण परिषद् को विधानसभा में किसी तरह का नुकसान होता नहीं दिख रहा है. आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो असम विधासनभा की 126 सीटों में से 61 विधायक बीजेपी के हैं. उन्हें बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट के 12 और एक निर्दलीय विधायक का समर्थन हासिल है. कांग्रेस के यहां 25 और आल इंडियन यूनाइटेड फ्रंट के 13 विधायक हैं और असम गण परिषद् के 14 विधायक हैं. असम में जादुई आंकड़ा 63 का है और अब उसके अलग होने से सर्बानंद सोनेवाल सरकार को कोई ख़तरा नहीं है.

सोनेवाल सरकार में तीन मंत्री…

सोनेवाल सरकार में एजीपी अध्यक्ष अतुल बोरा के साथ असम गण परिषद के 3 मंत्री शामिल हैं. संसद में उसका कोई सदस्य नहीं है. भाजपा से उसका गठबंधन 2014 के चुनाव से पहले हुआ था. एक टीवी चैनल से बोरा का कहना था कि तभी साफ कर दिया गया था कि इस बिल पर वह भाजपा का साथ नहीं देंगे.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *