2004 में बैरकपुर से हार चुके हैं अर्जुन सिंह

-जीत के लिए बहाने होंगे बहुत पसीना
कोलकाता : भाटपाड़ा के पूर्व तृणमूल विधायक व पालिका चेयरमैन अर्जुन सिंह ने गुरुवार को सभी अफवाहों को विराम देते हुए दिल्ली में भाजपा में शामिल हो गए। लेकिन उन्होंने भाजपा में शामिल होते ही पुलवामा आतंकी हमले का राग अलापा जो कोलकाता में दिए उनके बयान से मेल नहीं खाता है। यहां उन्होंने कहा था कि पार्षद बने बिना लोग मंत्री बन सकते हैं लेकिन 4 बार के विधायक होने के बावजूद उन्हें सांसद पद का टिकट नहीं दिया गया। क्यों? सिंह ने कहा था कि राजनीति समझौते का खेल है। लेकिन दिल्ली में उन्होंने कहा कि पुलवामा हमले के बाद जब पूरा देश सेना के साथ था और है तब ममता बनर्जी ने ठीक उल्टा बोल बोला जिससे वे काफी हताश हुए। इसके बाद ही उन्होंने भाजपा में शामिल होने का फैसला किया। ऐसे में सिंह के भाजपा में शामिल होने के कारणों के बारे में दिए गए बयान में काफी विरोधाभाष है। कोलकाता में दिया उनया बयान सही नहीं है क्योंकि तृणमूल कांग्रेस ने 2004 में उन्हें बैरकपुर से टिकट दिया था लेकिन वे माकपा के वरिष्ठ धाकड़ नेता तणित वरण तोपदार से सवा 2 लाख से भी अधिक मतों से चुनाव हार गए थे। बावजूद इसके ममता बनर्जी ने उन्हें भाड़पाड़ा से टिकट देकर विधानसभा पहुंचाया। लेकिन अब जब सिंह ने भाजपा का दामन थाम लिया है तथा उन्हें पार्टी टिकट भी देगी, दिनेश त्रिवेदी को बैरकपुर सीट पर हराना उनके लिए टेढ़ी खीर होगी। जीतने के लिए उन्हें बहुत ही पसीने बहाने होंगे।


मुकुल सबसे बड़ा गद्दार : मुकुल राय के भाजपा में शामिल होने पर अर्जुन सिंह ने 13 नवम्बर 2017 को बड़ा बयान दिया था तथा कहा था कि वे एक पार्षद का चुनाव भी लड़ कर देखें। उन्हें वे जीतने नहीं देंगे, यह उनकी मुकुल को चुनौती है। इतना ही नहीं सिंह ने कहा था कि वे मुकुल के बारे में केवल इतना ही कह सकते हैं कि मुकुल राय सबसे बड़ा गद्दार हैं।

बैरकपुर संसदीय सीट : बैरकपुर संसदीय सीट 1952-57 को छोड़कर पारम्परिक तौर पर वामपंथियों का गढ़ रहा है। 1962-77 तथा 1991-2009 तक लगातार यहां से माकपा के तणित वरण तोपदार चुन कर संसद पहुंचते रहे। 1977-80 तथा 1984-89 के दौरान सीट पर कांग्रेस का कब्जा रहा। लेकिन तृणमूल की टिकट पर दिनेश त्रिवेदी ने पहली बार की लड़ाई में ही 2009 मेंं तोपदार को रिकार्ड तोड़ वोटों से मात दी। इस बीच 2004 में तृणमूल की टिकट चुनाव लड़ कर अर्जुन सिंह भी तोपदार के हाथों करारी हार का सामना कर चुके थे। तोपदार के खिलाफ उन्हें तब 2.77 लाख वोट मिले थे जबकि तोपदार को करीब 4.80 लाख वोट मिले थे। लेकिन 2014 के चुनाव में उल्लेखनीय तौर पर भाजपा को 2009 के चुनाव के मुकाबले जबरदस्त छलांग लगाते हुए 2014 में यहां 2.30 लाख वोट मिले तथा यह तीसरे स्थान पर रही। माकपा दूसरे स्थान पर रही। इस प्रकार ऐसे में जब अब सिंह ने भाजपा की राह पकड़ी है, माना जा रहा है कि उन्होंने 2014 के नतीजे को ध्यान में रखते हुए ही कदम उठाया है। पता चला है कि सिंह के करीबी भी उनके फैसले के बारे में अंधेरे में थे। लेकिन मुकुल राय संग लंबी मंत्रणा व मोदी-अमित शाह के करिश्माई राजनीतिक अंदाज को धरोहर करके ही सिंह ने भगवा धारण करने का फैसला किया तथा उनका यह दावा किया कि पुलवामा पर ममता के रूख के चलते ही वे भाजपा में गए, उनके करीबी भी नहीं मान रहे। हालांकि, राजनीतिक कारणों से भाड़पाड़ा पालिका के दर्जन भर से भी अधिक पार्षद सिंह के साथ भाजपा में शामिल होने के लिए तैयार हैं।

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