मोदी सरकार में रोजगार: नए सेक्टर में अवसर बढ़े, लेकिन नौकरियों का घटना चिंताजनक

मोदी सरकार के कार्यकाल में रोजगार के मोर्चे पर संरचनात्मक बदलाव देखा गया है. कई नए सेक्टर में अब ज्यादा नौकरियां मिल रही हैं, लेकिन सरकार का अंत कई परंपरागत सेक्टर में नौकरियों के ठहर जाने या नौकरियों में कटौती के साथ हो रही है.

साल 2014 के चुनाव अभियान के दौरान बीजेपी ने वादा किया था कि सत्ता में आने पर वह हर साल एक करोड़ युवाओं को रोजगार देगी. अपने मेनिफेस्टो में बीजेपी ने कहा था कि 10 साल के कांग्रेस के शासन ने देश को 20 साल पीछे कर दिया है और लाखों मर्द-औरतों को बेरोजगार कर दिया है. बीजेपी के घोषणापत्र में यह भी कहा गया कि मैन्युफैक्चरिंग, टूरिज्म, आईटी जैसे सेक्टर को बढ़ावा दिया जाएगा, जिनमें हर साल लाखों रोजगार पैदा करने की गुंजाइश है.

तिमाही श्रम सर्वे के सीरीज से यह साफ हो जाता है कि अर्थव्यवस्था में वास्तव में संरचनात्मक बदलाव आ रहा है. अब कंस्ट्रक्शन और आईटी/बीपीओ की जगह शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सेक्टर में सबसे ज्यादा नौकरियां मिल रही हैं. लेकिन 2019 के आम चुनाव से पहले बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार ने नौकरियों के बारे प्रासंगिक सभी तरह के आंकड़ों को छापने से ही रोक दिया है. तिमाही श्रम सर्वे (QES), रोजगार-बेरोजगारी सर्वे (EUS) और बहुप्रतीक्षित एनएसएसओ के 2017-18 पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) को सार्वजनिक करने से रोक दिया गया है. वजह साफ लगती है, क्योंकि इन सभी रिपोर्ट में देश में नौकरियों की धुंधली तस्वीर दिखती है.

साल 2008 में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए सरकार ने QES की शुरुआत की थी ताकि श्रम प्रधान आठ सेक्टर की निगरानी हो सके. इससे जरूरत पड़ने पर समय से उपयुक्त कदम उठाए जा सकते थे. साल 2016 में बीजेपी सरकार ने इसके स्कोप को और बढ़ाते हुए इसमें 80 फीसदी संगठित श्रमबल को शामिल कर लिया. नए QES सीरीज में मैन्युफैक्चरिंग, टूरिज्म और आईटी सेक्टर को भी शामिल किया गया. लेकिन सरकार ने अक्टूबर 2017 से इस सर्वे पर ही रोक लगा दी.

मैन्युफैक्चरिंग, हेल्थ और एजेुकशन सेक्टर शीर्ष पर

नए QES सीरीज के सात सर्वे से यह पता चलता है कि देश में नौकरियों की हालत में काफी संरचनात्मक बदलाव आ रहा है. निर्माण और आईटी-बीपीओ सेक्टर नौकरियां देने के मामले में अगुआ नहीं रह गए हैं और न ही टूरिज्म सेक्टर में उस तरह से लाखों नौकरियां पैदा हो पा रही हैं, जैसा बीजेपी ने उम्मीद लगाई थी. नौकरी देने के मामले में अब तीन शीर्ष सेक्टर हैं- मैन्युफैक्चरिंग, हेल्थ और एजेुकशन. हालांकि इन सेक्टर में भी बहुत ज्यादा नौकरियों का सृजन नहीं हो रहा. उदाहरण के लिए मैन्युफैक्चरिंग में सात तिमाहियों में (जिनमें निगरानी हुई) सिर्फ 1.99 लाख नौकरियां मिली, जबकि कुल 1.01 करोड़ नौकरियों के साथ यह निगरानी किए जाने वाले सभी सेक्टर का 49.3 फीसदी रोजगार देता है.

यही नही, दो तिमाहियां तो ऐसी थी, जिनमें इस सेक्टर में क्रमश: 12,000 और 87,000 नौकरियों का सृजन हुआ. इसके बाद 1.89 लाख जॉब के साथ एजुकेशन सेक्टर दूसरे स्थान और 1.08 लाख नौकरियों के साथ हेल्थ सेक्टर तीसरे स्थान पर है. सर्वे वाली अवधि में इन तीनों सेक्टर में कुल मिलाकर नई नौकरियों का 80.5 फीसदी हिस्सा रहा.

QES सर्वे से पता चलता है कि इस दौरान निर्माण क्षेत्र की नौकरियों में 35,000 तक की गिरावट आई है, जबकि आईटी-बीपीओ में भी केवल 38,000 नई नौकरियों का सृजन हुआ. हालांकि नए QES सीरीज को भी संदेह की नजर से देखा जा रहा है, क्योंकि इन आंकड़ों में दो बड़े आर्थ‍िक झटकों नोटबंदी और जीएसटी के असर को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया है. नोटबंदी नवंबर 2016 में और जीएसटी जुलाई 2017 में लागू किया गया.

नोटबंदी और जीएसटी से हुए थे लाखों बेरोजगार

इस बात के अब प्रत्यक्ष प्रमाण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं कि इस दोहरे झटकों ने अर्थव्यवस्था को बेपटरी पर कर दिया था और इससे बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हुए. द सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के अध्ययन से पता चलता है कि साल 2017 के पहले चार महीनों में 15 लाख लोगों की नौकरियां चली गईं. ऑल इंडिया मैन्युफैक्चरर्स ऑर्गनाइजेशन (AIMO) के मुताबिक इस दोहरे झटके से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) में 35 लाख लोग बेरोजगार हो गए.

लेकिन सरकारी आंकड़ों के मुताबिक नोटबंदी और जीएसटी से पहले ही जुलाई-अक्टूबर 2016 की तिमाही में ही चार सेक्टर-कंस्ट्रक्शन, ट्रेड, एकोमोडेशन, रेस्टोरेंट और एजुकेशन में नौकरियों में कटौती हो गई थी, जबकि ट्रांसपोर्ट और हेल्थ सेक्टर में भी जॉब में बढ़त शून्य रही. हालांकि नोटबंदी और जीएसटी के बाद भी कंस्ट्रक्शन के अलावा बाकी सेक्टर में नौकरियों की संख्या बढ़ती रही. करीब एक दशक तक नौकरियों के सृजन में खास बढ़त न होने की वजह से यह जरूरी था कि सरकार अर्थव्यवस्था में नौकरियों के आंकड़ों पर नजर रखती, लेकिन शायद छवि खराब होने के डर से ऐसा नहीं किया गया. नौकरियों के सृजन के बारे में आंकड़े लेने और इसके बारे में कुछ करने का मौका गंवा दिया गया.

पहले जॉब कम था, अब तो है ही नहीं

साल 2014 में सत्ता में आने पर बीजेपी सरकार ने ज्यादा नौकरियों के सृजन का वादा किया था, लेकिन सरकार का अंत नौकरियों में भारी कटौती के साथ हो रही है. एनएसएसओ की 2017-18 पीएलएफएस रिपोर्ट को सरकार ने राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (NSC) से मंजूरी मिलने के बाद भी तीन महीनों तक रोके रखा, NSC के प्रमुख सहित दो सदस्यों ने विरोध में इस्तीफा भी दे दिया और आखि‍रकार यह दो अखबारों में छप गया. इसमें इस बात का साक्ष्य है कि नौकरियों के सृजन में सरकार विफल रही है.

रिपोर्ट के अनुसार साल 2017-18 में बेरोजगारी दर 6.1 फीसदी तक पहुंच गई है, जो पिछले 45 साल का सबसे ऊंचा स्तर है. साल 2011-12 से 2017-18 के बीच वर्कफोर्स की संख्या घटकर 4.7 करोड़ रह गई है, यानी नौकरियां घट गई हैं. इसी तरह श्रम बल भागीदारी दर (LFPR-नौकरी करने वाले या नौकरी की तलाश में लगे कार्यशील जनसंख्या का हिस्सा) भी साल 2011-12 के 55.9 फीसदी की तुलना में 2017-18 में घटकर 49.5 फीसदी रह गई है. इसका मतलब है कि कार्यशील जनसंख्या (15-60 वर्ष) का करीब आधा हिस्सा नौकरियों से बाहर है, क्योंकि नौकरियों के अवसर ही नहीं हैं.

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