सरसों के तेल में लगा महंगाई का तड़का, बिगड़ा रसोई का बजट

जय चौधरी


हुगली, समाज्ञा : एक तरफ वैश्‍विक महामारी कोरोना से हाहाकार मचा हुआ है। तो दूसरी तरफ महंगाई की मार से आम जनता त्रस्त है। पहले आलू , प्याज, दाल गरीबों की थाली से दूर होते जा रहे थे तो अब सरसों तेल जेब कतर रहा है। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस खाद्य पदार्थ के दामों में करोना काल में तेजी से इजाफा हुआ है। उसी तेजी से लोग रोजगार विहीन भी हुए हैं। लेकिन महंगाई कम होने का नाम नहीं ले रही। एक तरफ आमजन कोरोना वायरस से जूझ रहा है तो दूसरी तरफ सरसों के तेल की लगातार बढ़ रही कीमतों ने लोगों को परेशानी में डाल दिया है। खाद्य तेलों विशेषकर सरसों तेल के दाम एक महीने में दोगुना हो गए हैं। फुटकर बाजार में सरसों का तेल 200 रुपये प्रतिकिलो तक पहुंच गया है। वहीं रिफाइंड के दामों में भी इजाफा हुआ है। व्यापारी वर्ग इस बार सरसों की पैदावार काफी अच्छी होने से तेल के दाम कम होने का अनुमान लगा रहे थे, लेकिन सरसों के तेल पर छाई महंगाई के तड़के ने दाल व सब्जी में लगने वाले तड़के को और भड़का दिया है। बेतहाशा बढ़ रही सरसों तेल की कीमतों से गृहणियों की चिंता बढ़ गई है। बीते मार्च महीने के अंतिम सप्ताह में सरसों तेल एक सौ तीस रुपये लीटर था। वर्तमान में 200 रुपये प्रति लीटर मिल रहा है। रिफाइंड की कीमतों में भी करीब 60 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। देश की एक बड़ी आबादी पहले से ही महंगाई, कोरोना वायरस और लॉकडाउन की वजह से जूझ रही है। ऐसे में खाद्य तेल में दामों में हुई इस वृद्धि ने आम आदमी के बजट को तबाह कर दिया है। भारत में आमतौर पर 6 खाद्य तेल का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें सरसों का तेल, मूंगफली का तेल, डालडा (वनस्पति तेल), रिफाइंड (सोया तेल), सूरजमुखी का तेल (सनफ्लावर ऑयल) और ताड़ का तेल (पाम ऑयल) शामिल हैं। खाने में उपयोग होने वाले सभी खाद्य तेलों मूंगफली, सरसों का तेल, वनस्पति, सोयाबीन, सूरजमुखी और पाम ऑयल की कीमतें एक बार फिर बढ़ गई हैं।


क्या कहतें हैं तेल मिल मालिक


श्रीरामपुर स्थित सरसों तेल मिल संचालक तरुण भादुड़ी ने बताया कि अंतराष्ट्रीय बाजारों में पाम तेल सोयाबीन तेल के दामों में बेतहाशा वृद्धि हुई है जिसकी वजह से विकल्प के तौर पर सरसों तेल का उपयोग किया जा रहा है। सरसों तेल की मांग लगातार बढ़ रही है। दूसरी वजह वैश्‍विक महामारी कोरोना के समय सरसों तेल लाभकारी माना जा रहा है। भारत में खपत होने वाले खाद्य तेल का 56 प्रतिशत हिस्सा आयात किया जाता है। उन्होंने कहा कि इसकी एक वजह यह भी की भारत में आयात कर बहुत अधिक है। 30 से 40 रुपये प्रति किलोग्राम सरकार आयात कर ले लेती है। कहा कि सरसों तेल की कीमतें फिलहाल कम होने के आसार नहीं। यदि सरकार कोई ठोस कदम उठाती तो भले ही गिरावट आ सकती है।


क्या कहतीं है महिलाएं

गृहणी संध्या सिंह ने बताया कि रोजगार का कोई साधन नहीं। ऐसे में महंगाई आसमान छू रही है। कोरोना की वजह से रोजगार छीन गया, किसी तरह से गुजरा होता है। बिना तेल के सब्जी नहीं बन सकती और इससे समझौता भी नहीं किया जा सकता। रसोई का बजट बिगड़ गया है। यही हाल रहा तो फांका कसी करनी होगी। सरकार को मौन धारण करने से नहीं चलने वाला।
गृहणी रंजना कुमारी ने कहा कि उम्मीद थी की अच्छे दिन आएंगे पर ऐसे अच्छे दिनों की उम्मीद नहीं थी। रसोई गैस पेट्रोल खाद्य तेल दाल चावल सभी चीजों के दाम बढ़ गए। एक तो लॉक डाउन की वजह से रोजगार छीन गया ऊपर से सरसों तेल जिसके बिना खाना नहीं पकाया जा सकता 200 के पार हो गया। इसे जेब कतराना नहीं तो और क्या कहेंगे।
गृहणी सुमन तिवारी ने कहा कि अब और बर्दास्त करने की क्षमता नहीं। रसोई का बजट पूरी तरह से बिगड़ चुका है। रोजागर नहीं। रोजमर्रा की जरूरतों को कहां से पूरा करेंगे। मध्यवर्गीय परिवार की यह हालत है कि एक दिन खाना तो दूसरे दिन भूखे सो जाना नौबत यह आन पड़ी है। अब सरकार को स्वेच्छा मृत्यु का पत्र लिखना पड़ेगा। सरकार के पास कोरोना से मुकाबला का कोई विकल्प नहीं तो राम भरोषे उन्हें छोड़कर लॉक डाउन कर देती है। आम जनता के रोजमर्रा की जरूरत कैसे पूरी होगी एक बार सोचना चहिये।
गृहणी गौरी देवी ने कहा कि कुछ तो रहम करो सरकार बहुत हो गई महंगाई की मार, ऐसे अच्छे दिन नहीं चहिये सरकार। उन्होंने अपनी आपबीती बयां करते हुए बताया कि 15 दिन भोजन तो 15 दिन एक समय भोजन करके समय व्यतीत कर रहे हैं। तीन वर्षों से कोई रोजगार नहीं। ऊपर से कोरोना माहमारी से हाहाकार के बीच बेतहाशा महंगाई की मार। पहले प्याज, आलू दाल थाली से दूर थी, अब तेल पर मार पड़ी है। मध्यमवर्गीय परिवार के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है।

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